करोना के शोर में युद्ध की ओर बढ़ता विश्व ! क्या दुनियां शीघ्र ही किसी महायुद्ध की ओर कदम बढ़ाने जा रही है ? अचानक करोना का युद्धनाद क्यो ?

एक साल पहले WTO करोना या कोविड - 19 नामक महामारी की घोषणा करता है तथा इसी के साथ विश्व भर में आर्थिक गतिविधियों एवम् यात्राओं पर भी विराम लग जाता है। यद्धपि डोनाल्ड ट्रंप तथा अन्य कई विशिष्ट व्यक्ति इसको झूठा प्रोपेगेंडा बताते हैं किंतु भय के वातावरण में ज्यादातर देश लॉक डाउन का सहारा लेते हैं और इसी पेंडमिक काल में आर्मेनिया तथा अज़रबैजान में युद्ध होता है जिसमे दशकों से विवादित क्षेत्र अज़रबैजान द्वारा वापिस ले लिया जाता है। ( करेक्शन किया जाता हैं ) इसी दौरान भारत और चीन में विवाद बढ़ता है तथा चीन की सेनाए भारतीय क्षेत्रो मे घुसकर कब्ज़ा कर लेती है यद्धपि भारतीय प्रधानमंत्री इसका खण्डन करते हैं किन्तु स्वतंत्र विश्लेषकों के अनुसार चीन द्वारा अपनी आवश्यकता अनुसार सुरक्षित स्थानों पर कब्ज़ा बनाया जा चुका है। पुनः करोना महामारी की दूसरी, तीसरी या चौथी लहर का शोर प्रारम्भ हो गया है जिसका असर कुछ देशों में बहुत अधिक देखा जा रहा है विशेषकर यूरोप अथवा अमेरिकी लॉबी के देशों में उदाहरणार्थ भारत में भय का वातावरण है तथा आंशिक लॉक डाउन शुरू भी हो चुका है लेकिन चंद कदम दूर पाकिस्तान में इतनी सख्ती नहीं है तथा पीड़ितो एवम् मरने वालों का प्रतिशत भी कम है। भारत में भी जिन राज्यो में चुनाव हो रहे हैं वहां करोना महामारी का आगाज़ अभी नहीं हुआ है और चुनावी रैलियों में भीड़ तथा मंत्रियों पर यह वायरस असरकारक भी नहीं लगता। लेकिन यदि विभिन्न समाचार पत्रों को देखे तो लगता है कि इस महामारी के शोर में दुनियां किसी बड़े युद्ध में धकेले जाने वाली है जिसका केंद्र न चाहते हुए भी एशिया हो सकता है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति सुश्री कमला हैरिस L A राज्य के औकलैंड में गम्भीर बयान देते हुए कहती है " For years there were war, fought over oil; In a short time there will be wars fought over water". इसके दूसरी ओर ताइवान का बयान आता है कि वो अंतिम क्षण तक लडने के लिए तैयार हैं The Guardian लिखता है " Taiwan says, it will fight to the end" इसके अतिरिक्त वाशिंगटन पोस्ट, फॉरेन पॉलिसी, एशिया न्यूज भी ताइवान तथा चीन के बीच बढ़ते तनाव की खबरे दे रहे हैं। यद्धपि इसी बीच जापान के प्रधानमन्त्री अमेरिका जाने वाले है और किसी विदेशी राष्ट्रध्यक्ष का बाइडेन काल में यह पहला दौरा होगा। इसी सन्दर्भ में चीनी विदेश मंत्री की जापान के प्रधानमन्त्री से टेलिफोनिक सम्पर्क की खबरे भी मिल रही है । डेढ़ घंटा लंबी बातचीत में चीन द्वारा केवल ताइवान को people Republic of China का हिस्सा बताने पर जोर दिया गया तो क्या चीन द्वारा ताइवान को अपने साथ मिलाने के लिए किसी योजना पर विचार किया जा रहा है और यदि ऐसा है तो अमेरिका तथा उसके सहयोगी देश क्या करेंगे ? एक अन्य समाचार के अनुसार रूस के सैनिकों के युक्रेन सीमा पर जमावड़े की खबरे है और युक्रेन ने इमरजेंसी हालात में युक्रेन द्वारा उसको नाटो संगठन का सदस्य बनाने की अपील की गई है जबकि रूस के लिए नाटो का नाम ही आग में घी के बराबर होता है। युक्रेन के राष्ट्रपति का ओमान तथा तुर्की का दौरा भी तनाव बढ़ाने का कारण बन सकता है। तीसरा और भारत तथा दक्षिण एशिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण अफगानिस्तान से भी बढ़ती अशांति के समाचार है। हालात यहां तक खराब है कि पाकिस्तान के संसदीय दल को काबुल एयरपोर्ट से वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा क्योंकि उनके जहाज़ को security threat था। वैसे भी माना जा रहा है कि यूएस फॉर्सेस वायदे के अनुसार एक मई तक वहां से नहीं निकलेंगी और अमेरिका के दबाव से पाकिस्तान का बाहर निकल आना पेंटागन को स्वीकार्य नहीं होगा।। तो क्या अमेरिकी उपराष्ट्रपति का "पानी पर युद्ध" का अर्थ अगला सम्भावित बड़ा युद्ध समुंद्र में होने जा रहा है ? क्या साउथ चाइना सी तथा अरब सागर ( हरमूज एवम् ग्वादर तथा चाह बहार) में विभिन्न देशों की सेनाए भविष्य की महाशक्तियों का निर्णय करेंगी क्योंकि चीन द्वारा डिजिटल वैश्विक मुद्रा के आगाज़ के साथ उसका एक कदम आगे रहना पहले की स्वयंभू महाशक्तियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाना सुगम नहीं होगा।। आशा करनी चाहिए कि आर्थिक हितों के लिए चल रही रस्साकसी केवल बयान जारी करने तक ही सीमित रहेगी किन्तु राष्ट्रों के निज़ाम बदलने एवम् नई सरहदे बनना तो तय लगता है और शायद यह पीढ़ी किसी ऐतिहासिक परिवर्तन की साक्षी बनेगी।।