कानून की देवी की आंखो पर पट्टी होती हैं और यदि परम्परा है तो कोई प्रश्न भी नहीं होता कि आंखे खुली क्यो नहीं होती !

क्या सड़क पर चलती हुई आपकी कार एक पब्लिक प्लेस है या निजी संपति ? कुछ ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर में दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कार को पब्लिक प्लेस मानते हुए जो फैसला दिया उससे एक नई सामाजिक बहस शुरू हो गई है। करोना महामारी के कारण सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर मास्क लगाना अनिवार्य है लेकिन इसकी सजाएं अलग अलग राज्यों में अलग अलग निर्धारित है जैसे दिल्ली में 2000 रुपए जुर्माना अथवा 8 घंटे की अवैध हिरासत। कहीं सड़क पर उठक बैठक लगवा कर छोड़ दिया जाता है तो भारत के मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर शहर में एक रिक्शा चालक की दो पुलिस वालो ने अमानवीय तरीके से इतनी पिटाई की कि ब्लैक लाइफ मैटर्स की याद आ गई हालांकि रिक्शा चालक पिटाई के बावजूद जीवित बच गया। करोना महामारी के कारण 8 अप्रैल 2020 के आदेश के मुताबिक सार्वजनिक स्थलों पर मास्क लगाना अनिवार्य कर दिया गया लेकिन इसमें यदि कोई व्यक्ति अकेला कार से जा रहा हो तो उसे छूट प्राप्त थी। जैसा कि भारत के ग्रामीण इलाकों में सबसे ताकतवर पटवारी और दरोगा को माना जाता है तो एक अधिकारी ने तीन व्यक्तियों का अलग अलग चलान कर दिया जिसके विरोध में उन्होंने माननीय हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए अकेले चलने के कारण चालान राशि वापस कराने की गुहार लगाई। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच से जस्टिस प्रतिभा ने याचिका खारिज करते हुए कार को भी पब्लिक प्लेस करार दे दिया क्योंकि माननीय कोर्ट के अनुसार जिस प्राइवेट प्रॉपर्टी पर पब्लिक की अप्रोच हो सकती हैं उसे पब्लिक प्लेस भी माना जा सकता है।हालांकि इस सम्बन्ध मे कोई यूनिवर्सल नियम या परिभाषा तय नहीं की गई हैं। बिहार के केस का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 25 जून 2016 को सतविंदर सिंह को झारखंड राज्य के गीरडीह से पटना अपनी निजी कार से आते हुए बिहार पुलिस ने पकड़ लिया क्योंकि बिहार राज्य में शराब पीने या रखने पर कानूनन पाबन्दी है। हालांकि सतविंदर सिंह की कार से कोई शराब बरामद नहीं हुई थी। केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और याचिका कर्ता ने दलील दी कि क्योंकि उसने बिहार की सरहद में ड्रिंक नहीं की थी तो उसे सजा देना गैर कानूनी है और उसने राज्य के बाहर भी अपनी निजी कार में पी थी जिस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दलील मान ली लेकिन स्पष्ट कर दिया कि सड़क पर खड़े या चलते हुए वाहन को पब्लिक प्लेस माना जा सकता है। इसी निर्णय के आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला तो सुनाया है किन्तु जिस प्रकार पब्लिक प्लेस पर सिगरेट पीना या थूकना दंडनीय अपराध है तो क्या कार के अंदर बैठ कर सिगरेट पीने पर भी जुर्माना वसूला जा सकता है ? अजीबो गरीब तर्क - कुतर्क के दरम्यान एक कहानी याद आती हैं " All about a dog"