दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी चुनाव

Last Updated: Apr 08 2021 16:58
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दिल्ली की कुल आबादी का 9 प्रतिशत सिख समुदाय बेशक सेवा कार्यों में 90% भागीदार रहता हो और गुरुद्वारा साहेबान में दर्शन दीदार के लिए आने वाली संगत में बड़ी संख्या में गैर सिख भी आते हो किन्तु जब चुनावी दंगल होता है तो धर्म और सिखी के नाम से वोट मांगे जाना स्वाभाविक है। दिल्ली सरकार के गुरुद्वारा चुनाव निदेशालय की सूचना के अनुसार प्रत्येक चार साल बाद होने वाले दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव इस वर्ष होने जा रहे हैं जिसके लिए नामांकन 7 अप्रैल तक भरे जाने थे तथा 10 अप्रैल तक नाम वापस लेने की अंतिम तिथि है। चुनाव 25 अप्रैल को सम्पन्न होंगे तथा 28 अप्रैल को गिनती के बाद परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। इसके लिए दिल्ली सरकार द्वारा 23 चुनाव अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। DSGPC के कुल 55 सदस्य होते है जिनमे 46 सदस्य निर्वाचित होते है तथा पांचों तख्तों के जत्थेदार साहेबान भी स्वमेव सदस्य होते है। इसके अतिरिक्त एसजीपी का एक नामित प्रतिनिधि सदस्य होता हैं तथा सभी सिंह सभाओं से दो सदस्य नामित किए जाते है जिनका निर्णय लॉटरी सिस्टम से होता है। DSGPC एक्ट 1971 के नियम 14 में 2010 में किए गए संशोधन के बाद अब केवल सोसाइटी एक्ट में पंजीकृत पार्टियां ही चुनाव में हिस्सा ले सकती हैं। डीएसजीपीसी न केवल गुरुद्वारा साहेबान का प्रबन्धन करती हैं अपितु इसके अंतर्गत चलने वाले स्कूल एवम अस्पताल का प्रबन्ध भी देखती है। पिछले दो चुनावों से लगातार अकाली दल ( बादल गुट ) विजय प्राप्त करता रहा है। इस बार अकाली दल के परमजीत सिंह सरना द्वारा भी कामयाबी का भरोसा व्यक्त किया जा रहा है किन्तु उन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार भी खड़े नहीं किए। सरना ग्रुप एवम् वर्तमान प्रबन्धक सिरसा गुट द्वारा एक दूसरे पर आरोपों प्रत्यारोपों की झडी लगी हुई है और संगत इसमें कोई रुचि नहीं दिखा रही। यदि जमीनी हकीकत देखे तो गत टेन्योर में मनजिंदर सिंह सिरसा को सेवा करने के बहुत से अवसर प्राप्त हुए और उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां निभाई भी जिससे उनकी व्यक्तिगत साख अच्छी हुई है। इसमें लॉक डाउन के समय लंगर सेवा, किसानों के आंदोलन में लंगर सहित अन्य सेवाएं उपलब्ध कराना तथा निशुल्क डायलिसिस अस्पताल प्रमुख है। निसंदेह इससे मनजिंदर सिंह सिरसा की निजी साख को सहारा मिला और वो गैर सिख समाज में भी लोकप्रिय रहे यद्धपि अनुभव किया गया कि दिल्ली की सिख संगत बादल के नाम से प्रभावित नहीं है और यदि पंजाब से बादल परिवार का कोई सदस्य इनके समर्थन में आता है तो उसका नकारात्मक प्रभाव अधिक हो सकता है। अकाली दल सरना से अधिकांश संगत को उनके उपलब्ध न होने की शिकायत भी सुनी गई जबकि सिरसा डोर टू डोर कम्पेन भी कर रहे हैं तथा मीडिया का भी भरपूर उपयोग कर रहे हैं। निसंदेह अंतिम निर्णय संगत का होता है किन्तु अधिकांश श्रद्धालु मानते है कि गुरुद्वारों को सियासत के अखाड़े नहीं बनाना चाहिए।