रूस के विदेश मंत्री की यात्रा से उपजे सम्भावित संदेह

Last Updated: Apr 08 2021 14:07
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शायद निर्दोष जान गवाने वाले इंसानों में सबसे अधिक संख्या सड़क पर चलने वाले पैदल यात्रियों की होती है और यदि और गहराई से अध्ययन किया जाए तो उनमें भी वो लोग ज्यादा जान की बाजी हारते हैं जो या तो दोराहे पर कन्फ्यूज रहते है कि किधर जाना चाहिए या पैदल सड़क पार करने का दुस्साहस करते है। गत दिनों भारत के प्रधानमन्त्री जी ने पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री को उनके पाकिस्तान दिवस पर शुभकामनाएं संदेश भेजा जो कि भारतीय विचारधारा के अनुसार अनुचित था और देश की अखंडता के विरूद्ध भी था लेकिन शायद LOC पर युद्धविराम के बाद सम्बन्धों को बेहतर बनाने का प्रयास रहा होगा। उसके जवाब में इमरान खान साहब का धन्यवाद पत्र भी आया किंतु दोनों पत्रों के कूटनीतिक विश्लेषण से अधिकांश विचारकों ने इसे मेंगन ( चूहे के अवशिष्ट ) डालकर दूध देना ही बताया। इसके बाद अचानक पाकिस्तान सरकार द्वारा भारत से व्यापारिक रिश्ते सामान्य करने का समाचार प्राप्त हुआ किन्तु मात्र 24 घंटे में इमरान सरकार ने यू टर्न लेते हुए पहले कश्मीर समस्या की मांग उठा दी तथा अब चीनी आयात करने के ग्लोबल टेंडर से भारत को ब्लैक लिस्टेड करके बहुत नकारात्मक संदेश दिया। इन्हीं सबके बीच रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव अपनी भारत पाकिस्तान यात्रा शुरू करते हैं और भारत में चल रहे कवार्ड्स देशों के नेवल युद्धाभ्यास के समय भारतीय प्रधानमन्त्री अथवा विदेश मंत्री के अतिरिक्त किसी अन्य विशिष्ट व्यक्ति से मिले बिना इस्लामाबाद रवाना हो जाते है। पाकिस्तान जाने से पहले औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों ( भारत एवम् रूस ) विदेश मंत्री भारत द्वारा किए गए S-400 खरीदी समझौते पर चुप्पी साध लेते है और रूस के विदेश मंत्री द्वारा अमेरिका की आलोचना के साथ असामान्य संकेत भी प्राप्त होता हैं। इस्लामाबाद यात्रा के समय उनकी मुलाकात प्रधानमन्त्री इमरान खान से भी होती हैं एवम् वहां के मीडिया में भी इस यात्रा को प्रमुखता से हाई लाइट किया जाता हैं, वैसे भी किसी रूसी विदेश मंत्री द्वारा 9 साल बाद की गई यात्रा थी ( 9 साल पहले भी यही विदेशमंत्री थे ) वहां प्रत्यक्ष रूप से कूटनीतिक प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए ये यूएस के एशिया पेसिफिक ( अमेरिका इसे इंडो पेसिफिक कहता है ) कमांड की आलोचना करते हैं तथा पाकिस्तान को आधुनिक हथियारों की सप्लाई तथा सामरिक सहयोग की बाते करते हैं जिसे सब जानते है कि पाकिस्तान द्वारा हथियार केवल भारत के विरूद्ध ही खरीदे जाते है। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान के हालात पर बोलते हुए बाहरी आतंकवाद जैसे शब्दो का उपयोग अप्रत्यक्ष तौर पर यूएस और भारत को निशाना बनाकर ही किया गया होगा। अगली कड़ी में सर्गेई लावरोव ईरान भी जाएंगे और उनके साथ रूस द्वारा नियुक्त अफगानिस्तान मामलों को देखने वाले विशेष सलाहकार भी होते है। इसी के साथ ईरान तथा चीन के बीच हुए दीर्घावधि के समझौते को भी ध्यान रखना चाहिए तथा अमेरिका द्वारा ईरान से अपनी पुरानी न्यूक्लीयर संधि को पुनर्जीवित करने के लिए वियेना में चल रही बातचीत को भी ध्यान रखना चाहिए। रूस की इच्छा है कि इस क्षेत्र को सभी प्रकार के विवादों से मुक्त रखा जाए तथा सभी देशों के बीच बेहतर सम्बन्धों के लिए बड़ी भूमिका तैयार की जाए जिससे पश्चिमी ताकतों को दखल देने का अवसर न मिल सके। शायद रूस के दबाव से ही भारत पाकिस्तान के बीच प्रेम कहानी शुरू हुई होगी। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए अधिक चिंता का कारण है क्योंकि अभी तक उनकी नीतियां अमेरिकी हितों के इर्द गिर्द घूमती रही है और आज वो दोराहे पर कन्फ्यूज खड़ा है जिसमे एक ओर तो चीन के आर्थिक अहसानों तले दबा हुआ है, रूस से पाइपलाइन प्रोजेक्ट और GEP पर समझौते कर रहा है दूसरी ओर अमेरिकी दबावों के सामने भी झुक जाता हैं क्योंकि जानता है कि अमेरिका आसानी से अफगानिस्तान से वापिस नहीं निकलेगा और जब तक रहेगा तब तक प्रोक्सी वार भी रह सकती हैं। ऐसा ही ईरान के साथ है जो अमेरिका से वार्ता भी कर रहा है तथा चीन से सामरिक सहयोग की पींगे भी बढ़ा रहा है। लेकिन अभी यूएस ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है और सम्भव है कि उसका भारत को युद्ध में धकेलने का दबाव बढ़ जाए तथा भारत चीन सीमा पर बर्फ हटने के साथ ही सैनिक उसकी जगह न लेने लगे। हालांकि एक बार फिर भारत - चीन सीमा वार्ता 10 या 11 अप्रैल को होने की चर्चा है।। देखते हैं कि भविष्य के गर्भ में क्या है किन्तु केवल शांति ही होगी, इसकी उम्मीद कम है!