रूस के विदेश मंत्री की भारत यात्रा मीडिया द्वारा उपलब्ध जानकारी और कुछ कड़ियों को जोड़ने से होने वाले रहस्योद्घटन !

रूस के विदेश मंत्री श्री सर्गेई लावरोव अपनी दो दिवसीय भारत यात्रा के बाद इस्लामाबाद ( पाकिस्तान ) रवाना हो रहे है लेकिन उनकी यात्रा को लेकर भारत सरकार तथा भारतीय मीडिया में जिस प्रकार की चुप्पी देखी जा रही है वो अप्रत्याशित लगती हैं। रूस और भारत की मित्रता दशकों पुरानी है तथा आज़ादी के बाद से ही प्रत्येक कठिन परिस्थिति में रूस ने सदैव भारत का साथ दिया है जिसके कारण जहां बांग्लादेश का निर्माण सम्भव हुआ वहीं भारत ब्रह्मोस जैसी मिसाईल प्रणाली का निर्माण कर सका। इसी के चलते आज भारतीय सेना के लगभग 67% हथियार या तो रूस निर्मित है या रूस की मदद से बनाए गए हैं। हाल ही में विदेश मंत्री की भारत यात्रा का उद्देश्य बीस वर्षो से चली आ रही वार्षिक शिखर बैठक का पिछले वर्ष न होना तथा इस वर्ष उसकी तैयारियां बताया गया है वहीं अफगानिस्तान से अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी के बाद हालात संभालने में भारत के सहयोग की उम्मीद को भी जोड़ा जा रहा है। लेकिन यदि इस यात्रा से पहले के रूसी थिंक टैंक द्वारा प्रकाशित आलेखों को भी याद करे तो लगता है कि रूस द्वारा भारत को विशेष रूप से मोदी सरकार को पूर्ण रूप से अमेरिका की गोदी में बैठने से रोकने का एक प्रयास भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त क्योंकि भारत का काफी बड़ा निवेश अफगानिस्तान तथा ईरान में लगा हुआ था जो बदलती परिस्थितियों में शून्य होने की उम्मीद है तो इसकी चिंता भी एक विषय हो सकता है। क्योंकि अफगानिस्तान में भारत का बड़ा स्टेक है तो ऐसा समझा जाता है कि जब तक भारत का समर्थन अशरफ गनी को प्राप्त है तब तक किसी शांति वार्ता को अंतिम परिणीती तक पहुंचाने में बहुत सी मुश्किलें आएंगी। इसके साथ साथ मोदी सरकार द्वारा अमेरिका से तीन महत्वपूर्ण सामरिक समझौते कोमकासा से बीका तक भी रूस के लिए चिंता का विषय है क्योंकि अमरीका के नेतृत्व में इंडो पेसिफिक क्वार्ड गुट को चीन तथा उसके सहयोगी देश एशियन नाटो के रूप में देखते हैं और नाटो का अर्थ ही रूस के लिए नकारात्मक होता था। पिछले साल के दो रूसी थिंक टैंक के आलेख देखे तो एक अन्य स्मभवना भी सामने आती है जिसकी आशा बेशक रूस कर सकता हो किन्तु मोदी सरकार के संकेत नेगेटिव ही है। इसके पीछे रूस के विदेश मंत्री की यात्रा के समय ही भारत के समुंद्री तटो पर कवॉड्स देशों की नौसेना का युद्धाभ्यास है जिसमे फ्रांस को भी सम्मलीत किया गया है। RIAC नामक सरकारी थिंक टैंक तथा वालदाई क्लब द्वारा 2019 के अंत में छपे आलेख के अनुसार चीन की महत्वकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड के साथ साथ रूस ग्रेटर यूरेशिया पार्टनरशिप प्रोजेक्ट शुरू कर रहा है। ( Vestnic.mgimo.ru ) इसके अतिरिक्त रूस चाहता है कि भारत एवम् रूस मिलकर पुनः गुटनिरपेक्ष आंदोलन को जीवित करे तथा भारत के पड़ोसी देशों से चल रहे विवाद समाप्त होकर क्षेत्र में शांति प्रयासों को बल मिले। यद्धपि हमेशा से चलती आ रही विदेशनीति के अनुसार ये सभी प्रस्ताव सकारात्मक लगते है किन्तु वर्तमान सरकार द्वारा पूर्ण रूप से अपने हितों को अमेरिका के साथ जोड़ देना ऐसी किसी संभावना की आशा जागृत नहीं होने देती। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार द्वारा अमेरिका से किए गए समझौते भी बड़ी अड़चन के रूप में सामने आ सकते हैं। शेष निर्भर करता है कि आने वाले दिनों में रूसी विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंचकर क्या बयान देते है और क्या संकेत मिलते है।