दक्षिण एशिया की शांति और समृद्धि का एक मजबूत स्तंभ जिसे कभी धर्म की आड़ में तो कभी सियासत के लिए तोड़ दिया गया।

अहले हिंदुस्तान जिसे हम दक्षिण एशिया या भारतीय उपमहाद्वीप भी कह सकते हैं विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों और धर्मो का ऐसा बगीचा है जैसे गुलाब का फूल होता है। गुलाब की कली यदि प्रेम प्रस्ताव और समर्पण की प्रतीक होती हैं तो उसकी टहनी के कांटे जीवन की हकीकतों का भी अहसास कराते हैं तथा शायद गुलाब ही है जो मरकर भी गुलकंद बनकर मिठास देने की सलाहियत रखता है। इसी बगीचे में बाहरी आक्रमण होते रहे, अंदरुनी खून खराबे भी हुए, धर्म स्थापित भी हुए और बाहर से आकर बसेरा भी बनाया लेकिन पंजाबियत को कोई आंच नहीं आई तथा जब तक संस्कृति जिंदा रही तब तक शांति और समृद्धि भी बनी रही। 1947 से पहले ही पंजाबी समाज के दरम्यान धर्म की लकीरें खींचने की कोशिश शुरू हो गई थी और इसकी पहली चोट शाह् मुखी की समाप्ति के साथ शुरू हुई जब आर्य समाज ने देवनागरी लिपि को बढ़ावा देने की मुहिम शुरू की। ऊंच नीच के बावजूद समाज चलता रहा और पूर्वी पंजाब में पंजाबी सूबे के नाम पर चलाई गई मुहिम ने पंजाब को तीन हिस्सों में बांट दिया तथा जिस हिस्से को पंजाब का नाम दिया गया उसे सिख बहुल राज्य भी कहा जाने लगा। उधर के पंजाब में बांग्ला देश बनने के बाद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को अपनी जनता को शर्मिंदगी से बचाना था तो उसने भी पंजाबियत पर पहली चोट की और पाकिस्तानी सेना की असफलता या हार का ठीकरा पंजाबी बहुल सेना होने के नाम फोड़ दिया तथा इसी के साथ राष्ट्रवाद एवम् मुस्लिम पाकिस्तान की मुहिम का आगाज़ कर दिया जिसमे स्कूलों में पंजाबी बोलने पर पाबन्दी लगाई गई तथा सलवार कमीज़ को राष्ट्रीय पोशाक एवम् उर्दू बोलने को देशभक्ति से जोड़कर जनता को बरगलाया गया। इधर हम पंजाब से बाहर रहने वाले पंजाबियों पर कल एक विश्लेषण प्रकाशित कर चुके है ( कृपया उसे भी देखे ) इधर भी यदि अंग्रेजी आधुनिकता की पहचान बनाई गई तो हिंदी एवम् देवनागरी लिपि को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया और धीरे धीरे दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी संस्कृति धीमे जहर की शिकार बन गई।। मूल विषय पर आते है तो अनुभव करेंगे कि दक्षिण एशिया या भारतीय उपमहाद्वीप में अशांति का एकमात्र कारण भारत पाकिस्तान के बीच शत्रु भावना का जीवित रखा जाना ही है अन्यथा केवल पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जिससे भारत की सीमाएं एवम् जल बटवारा स्पष्ट है तथा कोई विवाद इन विषयों पर नहीं रहा अन्यथा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका के साथ सीमा विवाद रहे है और चीन तथा भारत के बीच तो कोई सीमा रेखा स्पष्ट ही नहीं है। फिर भी भारत एवम् पाकिस्तान के बीच शत्रुता बनी रहने का कारण कम से कम जनता तो नहीं जानती एवम् सरकारें समाप्त करना नहीं चाहती। यदि दोनों ओर की पंजाबियत को फिर से जीवित करने के प्रयास किए जाए तथा नेक नियत से कम से कम इस संस्कृति से जुड़े हुए नागरिकों को कुछ सहूलियतें दे दी जाए तो आशा की जा सकती है कि क्षेत्र में युद्धों के बादल छंट सकते है हालांकि एक प्रयास करतारपुर साहिब को लेकर हुआ जरूर था किन्तु एक साल से भी अधिक समय से वह भी बंद है और कब तक बन्द रहेगा कोई नहीं जानता। कुछ पीछे की ओर देखे तो हमे अहसास होगा कि दोनों ओर के पंजाबी बुद्धिजीवियों ने इस दिशा में कोशिशें जरूर की है। भुट्टो काल में ही नवां जमाना लाहौर में प्रकाशित लेख में हनीफ रामे पांच पंजाबी जंवा मर्दों के नाम "राजा पोरस, दुल्ला भट्टी, अहमद शाह खरल, भगत सिंह तथा निज़ाम लुहार" लिखते है। ( हनीफ रामे उधर के सम्मानित राजनेता भी रहे है ) इधर के पंजाब से 70 के दशक में अतर सिंह, प्रोफेसर प्रीतम सिंह तथा विश्वनाथ तिवारी ( कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी के पिता जी ) जैसे विद्वानों ने पुरजोर आवाज़ उठाई है। पिछली पीढ़ी में मंटो हो या खुशवंत सिंह अथवा कुलदीप नैयर जैसे लेखक तथा प्रकाश कौर और सुरिंदर कौर जैसी बहने या उधर मुस्र् रत जैसी विवाह शादी पर गाए जाने वाले लोक गीतों को जिंदा रखने वाली गायिका इनके प्रयासों को कोई कैसे नफरतों के पिंजरे में कैद कर सकता है। इतिहास में भी शाह मोहम्मद अपने किस्से "जंगनामा : सिंहा ते फिरंगिया दा" में सिखो की बहादुरी की प्रशंसा करते हैं और हार पर दुखी होकर कहते है " शाह मोहम्मद बीच पंजाब दे जी कदे नहीं सी तीसरी जात आई। सूरमा नैना दी धार विच फब रह्या चढ़या हिन्द ते अटक पंजाब दा जी।। इन सबके बावजूद लकीरें खींच दी गई और यदि दोनों देशों की सरकारें चाहें तो आज भी अपनी अपनी अखंडता तथा संप्रभुता को बनाए रखते हुए पंजाबियत के भरोसे न केवल भारत पाकिस्तान अपितु दक्षिण एशिया में भी शांति और समृद्धि का गुलशन खिला सकती हैं क्योंकि पंजाब के वारिस शाह भी मुगलों का पक्ष नहीं लेते अपितु पंजाब लुटने पर कहते है " वारिस शाह जीवें मुग्ला पंजाब लूटटी जीवें जोगी दी रसद उजाडियों नी"