लोकां दे मनदे, दिवस - ध्याडे ; साढ़े हुंदे महीने जी....!!! सरवत का भला सोचने का मूल मंत्र लिए भारत से सात समंदर पार कनाडा में सिख विरासत के परचम।।

स्टोरी की शुरुआत एक रोचक सत्य घटना से करते हैं जिसे कई साल बाद भी भूल नहीं सकते यद्धपि इसके पीछे किसी संस्कृति की आलोचना या व्यंग नहीं है। एक बार पंजाबी मित्र के साथ गुजरात जाना हुआ और किसी विशिष्ट व्यक्ति के आमंत्रण पर उसके दफ्तर में गए। उसने आदर सम्मान के साथ चाय मंगाई जो वहां के अनुसार थी लेकिन पंजाबी मित्र ने पूछ ही लिया कि साहब ये चाय पीनी है या कान में डालनी है ( कटिंग चाय की मात्रा थोड़ी सी होती हैं ) वैसे भी यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो भारत के पश्चिमी हिस्से की तुलना में पंजाब की संस्कृति में बड़ी बड़ी वस्तुएं ज्यादा पसंद की जाती हैं। लस्सी का गिलास भी कड़ी वाला ( दस इंच से एक फीट बड़ा ) होता है और पटियाला पैग का परिचय तो देने की आवश्यकता भी नहीं है। इसी संदर्भ में जब दुनियां किसी विषय को लेकर "विशेष दिवस" मनाती हैं तो कनाडा सरकार ने आधिकारिक तौर पर सिख विरासत के लिए एक महीने की अवधि तय की है और 2019 से कनाडा में अप्रैल माह को Sikh Heritage month के रूप में मनाया जाता है। वैसे तो पहला सिख कनाडा की भूमि पर 19 वीं शताब्दी में आया था किन्तु 1917 - 2017 को शताब्दी वर्ष करार दिया गया और कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया राज्य के सरि न्यूटोियन क्षेत्र के सांसद जनाब सुखी धालीवाल ने अक्तूबर 2017 में बिल संख्या 376 के माध्यम से प्रस्ताव रखा कि अप्रैल माह को सिख विरासत महीने के रूप में मनाया जाए जिससे कनाडा वासियों को सिख समुदाय की पहचान तथा कनाडा के निर्माण में उनकी अहम भूमिका से परिचय कराया जा सके। इस प्रकार 2019 से आधिकारिक रूप से अप्रैल महीने को सिख विरासत महीने का स्तर प्राप्त हुआ। प्रेस सचिव Minister of Diversity & inclusion and youth, एमेल्याना तितारेंको ने इस अवसर पर प्रधान मंत्री मिस्टर जस्टिन ट्रुडो के behalf पर बताया कि सभी कनाडा वासियों को सिख विरासत एवम् इतिहास को देखने समझने हेतु आमंत्रित किया जाता है। संसदीय सचिव सुश्री रचना सिंह के अनुसार पहला गुरुद्वारा 100 वर्ष पहले ब्रिटिश कोलंबिया राज्य के वैंकूवर में स्थापित हुआ था जो भारत के बाहर सिख समुदाय का सर्वाधिक पसंद आने वाला स्थान है।अप्रैल माह इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी महीने में वैसाखी के दिन दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की सृजना की थी और तेग देग फतेह के साथ साथ आपे गुरु चेला का मंत्र भी दिया था।।