टैलेंट किसी का मोहताज नहीं होता और यदि ऐसा होता तो 2016 में नंगे पैर साधारण से कपड़े पहने एक आदिवासी को तात्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा पद्मश्री सम्मान से न नवाजा जाता।

31 मार्च 1950 भारत के उड़ीसा राज्य का पिछड़ा आदिवासी इलाका और एक बच्चा जन्म लेता है। जन्म के साथ ही बच्चे को शायद अहसास भी नहीं हुआ होगा कि गरीबी, अशिक्षा तथा पिछड़ापन उसके भाग्य का अभिन्न अंग है किन्तु समय की गति और परिवर्तन किसी की कल्पनाओं में भी नहीं थे। बच्चे की आयु दस वर्ष और कक्षा तीन, अचानक पिता का साया उठ गया और तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले अबोध बच्चे को अहसास हो गया कि जिम्मेदारियां किसे कहते हैं और गरीबी क्या होती हैं। भुखमरी से युद्ध में लडने हेतु वो हलवाई की दुकान पर बर्तन मांजने की नौकरी करने लगता है और दो साल बाद उसको स्कूल में खाना पकाने की सेवा मिल जाती है जहां वो 16 साल तक काम करता है। इसी दौरान उसे बैंक से 1000 ₹ ( रुपए एक हजार मात्र ) का कर्जा मिलता है जिससे वो स्कूल में स्टेशनरी शॉप खोलता है लेकिन फालतू कागजों पर अपनी स्थानीय/मातृ भाषा "कोसली" में कविताएं लिखता रहता है। 1990 में उसकी पहली कविता धोधो बरगाजी ( बूढ़ा बरगद ) स्थानीय अखबार में छपती हैं और उसे आसपड़ोस के गांवों, कस्बों से कविता पाठ के बुलाया जाने लगता है तथा लोक कवि रत्न अवार्ड भी मिलता है। 2016 में इन्हे पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाता है। सम्बलपुर यूनिवर्सिटी में इनकी कविताओं के संग्रह "हलधर ग्रंथावली - 2" को उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है तथा इनकी रचनाओं पर शोध कार्य भी किया जा रहा है। कभी जूता, चप्पल न पहनने वाले तथा धोती बनियान में आराम महसूस करने वाले आदिवासी कवि "हलधर नाग" को अपने द्वारा रचित असंख्य कविताएं एवम् 20 महाकाव्य कंठस्थ ( जुबानी याद ) हैं। बेशक लोक कवि हलधर नाग आप और आपकी प्रतिभा अतुलनीय है।।।।