भारत पाक सम्बन्ध ! पत्थर की फुटबाल से खेला जाने वाला सोकर्स मैच ! गत 75 साल से उतार चढ़ाव के बीच आम जनता की समझ में न आ सके रिश्ते किसी सियासी मजबूरियों के बन्धक कहलाए जा सकते है।

14 - 15 अगस्त ब्रिटिश साम्राज्य की वापसी के साथ ही दो स्वतंत्र राष्ट्रों का जन्म हुआ जिन्हे भारत और पाकिस्तान नाम दिया गया। सदियों से एक साथ रह रही दो सभ्यताएं पंजाब तथा बंगाल इस आज़ादी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई और उनकी अपनी विरासते एक ही झटके में पराई हो गई, उनके अपने ही पड़ोसी बेगाने बन गए और जिस स्थान की भाषा, संस्कृति से वाकिफ नहीं थे उसे उनका देश बता दिया गया। एक ही जमीन को बांटकर बनाए गए दो देश न जाने किस वजह से एक दूसरे के प्रतिद्वंदी होकर जीने को अपना भविष्य समझते रहे और इसके नतीजे में दोनों देशों की जनता ने न केवल युद्ध देखे अपितु गरीबी, अशिक्षा और अभाव भी देखा। प्रत्येक आने वाली नई सरकार के साथ ही बहुत सी उम्मीदें भी जागती रही हैं कि शायद ये सरकार सम्बन्ध बेहतर करने में सफल हो जाएगी लेकिन यदि अयूब खान संयुक्त सेना का प्रस्ताव रखते थे तो नेहरू मंत्रिमंडल स्वीकार नहीं करता था, अटल बिहारी दोस्ती बस लेकर जाते थे तो मुशर्रफ़ कारगिल दे देता था, मोदी जी नवाज़ शरीफ़ के घर पहुंच गए तो कश्मीर और अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर कुठाराघात हुआ। इसी कड़ी में परम्परा के विरूद्ध मोदी सरकार ने 23 मार्च को पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री को बधाई संदेश भेजा जो भारत की नीतियों के विरूद्ध था ( भारत दो राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता और पाकिस्तान डे इसी सिद्धांत की घोषणा के अवसर पर मनाया जाता है ) लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री जी के उत्तर में प्राप्त पाकिस्तानी धन्यवाद पत्र ने केवल जख्मों पर नमक छिड़कने का कार्य किया ( कूटनीतिक भाषा में इसे नकारात्मक उत्तर समझा जाना चाहिए ) गत दिवस तजाकिस्तान की राजधानी दुशांबे में हार्ट ऑफ़ एशिया सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें भारत तथा पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने भी भाग लिया। कहने के लिए तो यह अफगानिस्तान में शांति प्रयासों के लिए आयोजित बैठक थी किन्तु इस अवसर पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी द्वारा दिया गया भाषण अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय नीतियों की ओर आलोचनात्मक संकेत अधिक कर रहा था। बैठक के दौरान कई अवसरों पर दोनों विदेश मंत्रियों का आमना सामना हुआ किन्तु महसूस किया गया कि दोनों नजरे मिलाने से भी बच रहे थे। यहां तक कि बैठक के समय गोल मेज पर दोनों विदेश मंत्री आमने सामने बैठे थे तब भी एक दूसरे की ओर नहीं देखा तथा फोटो सेशन में भी एक साथ खड़े होने से बचते रहे। शाह महमूद कुरैशी द्वारा स्पष्ट कर दिया गया कि उनकी भारतीय विदेश मंत्री डॉ सुब्रमण्यम जयशंकर से औपचारिक मुलाकात का कोई इरादा नहीं है। इसके विपरित जब 5 अगस्त 2019 को भारत की मोदी सरकार ने कश्मीर को राज्य से केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया था और उसको विभाजित कर दिया था तो इमरान खान सरकार द्वारा भारत से व्यापार बंद करने तथा उच्चयोग का स्तर कम करने की घोषणा कर दी गई थी किन्तु उधर के सूत्रों की माने तो इमरान खान सरकार दोनों आदेश वापस लेते हुए पुनः व्यापार शुरू करने की दिशा में कदम उठाने जा रही है। इधर ऐसी भी संभावनाएं तलाश की जा रही है कि शीघ्र ही इस्लामाबाद में सार्क शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाए तथा उसमे श्री नरेंद्र मोदी भाग लेने जा सके। शायद इन्हीं सभी विरोधाभाषी नीतियों और समाचारों के कारण भारत पाक सम्बन्धों को सुलझी हुई उलझन की संज्ञा दी जाती है।

भारत पाकिस्तान के सम्बन्धों में निकटता के लिए पर्दे के पीछे चल रही बातचीत सफल होने की आशा से वार्ताओं के दौर सार्वजनिक करने की उम्मीद !

भारत पाकिस्तान के बीच बेहतर सम्बन्धों को लेकर मित्र देशों के माध्यम से चल रही बातचीत सार्वजनिक होने जा रही है और इसकी घोषणा भी शीघ्र हो सकती हैं।। ...

भारत पाकिस्तान सम्बन्धों में तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार करके हम परम्परागत स्थापित विदेश नीति को छोड़ चुके है !

भारत पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ होने की घोषणा से यूएई ने भारत सरकार को शर्मिंदा किया। ...

दक्षिण एशिया की शांति और समृद्धि का एक मजबूत स्तंभ जिसे कभी धर्म की आड़ में तो कभी सियासत के लिए तोड़ दिया गया।

दक्षिण एशिया को धीरे धीरे वैश्विक महाशक्तियों का अखाड़ा बनने की आशंका जताई जा रही हैं लेकिन भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध और शांति के झुलो के बीच एक संस्कृति ऐसी भी है जो क्षेत्र में शांति की गारंटी बन सकती हैं बशर्ते दोनों देश अपनी अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखकर भी पॉजिटिव सोच रख ले। ...