तेजी से बदलते वैश्विक परिवेश एवम् राजनीति में भारत की स्थिति पर एक नजर।

गत सप्ताह से चीन के विदेश मंत्री का मध्य एशिया का दौरा विश्व राजनीति में बहुत से नए आयाम स्थापित करने जा रहा है। उनका पहला पड़ाव भारत के सदियों पुराने मित्र एवम् सहयोगी ईरान की राजधानी में था जहां चीन एवम् ईरान के बीच दीर्घ अवधि का ( 25 वर्षीय ) सहयोग तथा मित्रता का समझौता हुआ जिसके अंतर्गत चीन आने वाले समय में ईरान में 400 अरब डॉलर का निवेश करेगा तथा ईरान चीन की वन बेल्ट वन रोड की महत्वकांक्षी परियोजना का हिस्सेदार बनेगा। सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाने वाली सिपेक् योजना में भी ईरान की साझेदारी लगभग तय है जिसको चहबहार तक बढ़ाया जा सकता है। ईरान के बाद अगला पड़ाव यूएई का है जिसका आगाज़ यूएई सल्तनत ने अपने यहां हूवाई की 5जी को अनुमति के साथ किया है, याद रखना चाहिए कि हूवाई कम्पनी को अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा बता कर प्रतिबन्ध लगा दिया था। इसके बाद चीनी विदेश मंत्री सऊदी अरब तथा तुर्की जाएंगे। आशा की जाती है कि ईरान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच चल रहे अविश्वास एवम् तनाव को दूर करने के लिए चीन मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो गया है और सऊदी अरब तथा यमन के हयुती के बीच अनवरत चल रहे युद्ध में भी शांति के प्रयास एवम् गारंटी की जिम्मेदारी लेने पर राजी है। इन सब घटनाओं के अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण घटना सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुवाई द्वारा चीन के बाहर सबसे बड़ा फ्लैगशिप स्टोर खोलना तथा अरामको कम्पनी में इसी कम्पनी द्वारा 5जी की सहायता एवम् कृत्रिम बुद्धि ( Artificial intelligence ) के उपयोग की संभावना तलाशना है। क्योंकि माना जाता रहा है कि सऊदी सल्तनत अमेरिका के दबाव में ही निर्णय लेती रही है तथा यूएस प्रशासन का काफी दखल रहा है तो इस प्रकार की खबरे किसी नए तथा बड़े परिवर्तन का संकेत देती हैं। इसी सन्दर्भ मे भारत की भूमिका एवम् भविष्य की चिंता भी एक चर्चा का विषय होना तो चाहिए किन्तु है नहीं जो आने वाले समय में आर्थिक रूप से देश को और पीछे की तरफ धकेल सकता है। भारत सरकार द्वारा यूएस से किए गए कॉमकासा एवम् बीका समझौतों के कारण फिलहाल ऐसा भी सम्भव नहीं है कि भारत की नीतियां तेजी से बदल कर दूसरे पक्ष के समर्थन में बन जाए। क्योंकि चीन और भारत के मध्य सीमा विवाद एवम् चीन का स्वयं को सीपेक् परियोजना में असुरक्षित महसूस करना भी बहुत बड़ी अड़चन समझी जा सकती है। फिर भी संभावनाएं जीवित रहती हैं और तलाश करते रहना चाहिए इसलिए आशा करते हैं कि निकट भविष्य में तुर्की में होने वाली अफ़गान शांति वार्ता कुछ सकारात्मक पक्ष उजागर करेगी