क्या दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसान आंदोलन अपनी समाप्ति की ओर है ? क्या लगातार चार महीने से मोर्चा लगाकर बैठे किसानों की थककर वापसी हो रही है ? क्या सरकार इस विश्व प्रसिद्ध आंदोलन को समाप्त करने की चालों में कामयाब हो रही हैं?

देश में भयंकर लॉक डाउन की घोषणा और निर्दयता से पूरे देश मे ताला बन्दी के समय भारत सरकार द्वारा तीन अध्यादेश लाए जाते है। फिर किसानों का हित बताते हुए संसदीय नियमो का उल्लंघन करके संसद से बिल पास कराए जाते है और उसी दिन राष्ट्रपति हस्ताक्षर भी कर देते है। हरियाणा और पंजाब के किसान इसका विरोध करते हैं लेकिन सरकार को कोई असर नहीं होता। मजबूरन 40 किसान संगठन दिल्ली आकर असहमति व्यक्त करने तथा शांति पूर्ण प्रदर्शन करने की घोषणा कर देते है। पंजाब से आने वाले हजारों किसानों को हरियाणा सरकार द्वारा रोकने की नाजायज कोशिश होती हैं और अंत में लाखो की संख्या में पंजाब, हरियाणा, यूपी एवम् देश के विभिन्न हिस्सों से आए किसान दिल्ली की सीमाओं पर धरना शुरू कर देते है। सरकार बातचीत का उपक्रम शुरू करती हैं और किसान नेताओ को यह केवल नाटक या सरकार द्वारा थकाने की प्रक्रिया बताया जाता है लेकिन बातचीत जारी रहती हैं। आखरी बार दो महीने पहले खेती किसानी मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर घोषणा कर देते है कि या तो सरकार के प्रस्ताव स्वीकार कर लिए जाए अन्यथा घर जाओ। 26 जनवरी सहित कई साजिशों के साथ आखिरकार सरकारी मीडिया द्वारा प्रोपेगेंडा शुरू हो जाता हैं कि किसान चार महीने के लंबे धरने के बाद थक चुके है और अपने घरों को वापिस लौट रहे हैं। 23 मार्च को शहीद भगत सिंह तथा अन्य साथियों के त्याग को याद करने के लिए शहीदी दिवस मनाया जाता हैं और News Number की टीम किसान तीर्थ पर जाकर अहसास करती है कि भारत सरकार या कथित मीडिया अभी तक पंजाबी संस्कृति और सभ्यता को या तो समझना नहीं चाहते या जानबूझकर अनजान बने हुए है। पहले दिन से आईं हुई ट्रेक्टर ट्रॉलियां आज तक अपनी निर्धारित जगह पर खड़ी है। भयंकर सर्दी में इन्हीं ट्रॉलियों को अपना बसेरा बनाकर खुले आसमान के नीचे मोर्चा लगा चुके किसान गर्मी के साथ भी दो दो हाथ करने की तैयारी कर रहे हैं। टोलियों में टीवी फ्रिज के अतिरिक्त एसी भी लगाए जा रहे थे और उपर खस की छत बनाई जा रही थी जिससे तपती धूप का सामना किया जा सके। कहना चाहिए कि चार महीने के अनुभव ने किसान आंदोलन को और व्यवस्थित रूप से लंबे समय तक चलने का अवसर दे दिया है। गावों से किसान रूटीन बना कर बारी बारी से आते है और जिसकी ड्यूटी आंदोलन स्थल पर होती हैं उसके खेतों की जिम्मेदारी गांव में रह रहे किसान मिल बांटकर पूरी कर देते है। सप्ताहांत तथा छुट्टी वाले दिनों में परिवार एवम् बच्चे भी तीर्थ यात्रा की आते है और अगले दिन वापस चले जाते है। विशेष अवसरों पर पंजाब से आए किसानों के समर्थन में स्थानीय हरियाणा निवासी तथा दिल्ली के माध्यम वर्ग की उपस्थिति भी बड़ी संख्या में देखी जा सकती है। क्योंकि किसी भी इंसान का बेशक किसानी से नाता न हो किन्तु रोटी से तो रहता ही है और इसी का प्रभाव है कि सेवा निवृत पूर्व अधिकारी, पूर्व सैनिक , वकील तथा अन्य बुद्धिजीवी भी बहुतायत में हाजरी दर्ज कराने आते ही है। आंदोलन स्थल पर छोटे बच्चो से लेकर जवान तथा बुज़ुर्ग भी उत्साह से डटे हुए देखे जा सकते हैं। जिन बाबा जी का चित्र है इनकी उम्र 90 साल है, ऊंचा सुनते हैं लेकिन भरोसा रखते है कि ये तब तक न मरेंगे न वापिस जाएंगे जब तक सरकार अपने तीनों कानून वापिस नहीं लेती तथा एमएसपी को कानूनी गारंटी नहीं देती। हमारे साथ इन बाबा जी की लंबी आयु तथा हमेशा स्वस्थ रहने की प्रार्थना करे तथा कृपया इसको अधिक से अधिक सांझा करे जिससे जिस सच के हकदार किसान आंदोलनकारी तथा गोदी मीडिया त्रस्त व्यक्ति है उन्हे भी हकीकत मालूम हो।

खाप व्यवस्था और किसान आंदोलन ! बाबा बन्दा सिंह बहादुर को दहिया खाप का प्रणाम।।

किसान आंदोलन और सरकार की साजिशें दोनों आमने सामने अपनी अपनी चाले चल रही है लेकिन हरियाणा के जाट समुदाय की दहिया खाप ने बीजेपी द्वारा फुट डालो राज करो की नीति का उत्तर अनाज से भरी ट्रॉलियां भेज कर दिया।। ...

किसान आंदोलन कर रहे किसानों द्वारा हरियाणा सरकार को खुली चुनौती। सरकार बैकफुट पर।

हरियाणा के विधायक देवेंद्र बबली द्वारा किसानों को गालियां दिए जाने और तीन किसानों की गिरफ्तारी के विरोध में आज हरियाणा के टोहाना में महापंचायत का आयोजन किया जा रहा है। ...

भारत सरकार द्वारा पारित तीन किसान विरोधी कानूनों के विरूद्ध आंदोलन कर रहे किसानों द्वारा विरोध दिवस।

किसान आंदोलन के छह महीने पूरे होने के साथ ही संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा 26 मई को काला दिवस मनाया जा रहा है। ...

किसान आंदोलन के छह माह पूरे होने के साथ ही सरकार की उदासीनता से एक बार फिर आंदोलन को नई ऊर्जा देने की कवायत

छह महीने से दिल्ली की सरहदों पर आंदोलन कर रहे किसानों द्वारा आंदोलन को फिर से नई ऊर्जा देने की तैयारी ...

हमे भूल तो नहीं गए ? बेशक बच्चे भूल जाए लेकिन मां बाप दुख सहकर भी बच्चो के लिए कुर्बानियां करते हैं।

बेमौसम बरसात के कारण किसान आंदोलन स्थल पर परेशानियां बढ़ी लेकिन उससे ज्यादा दुखद सरकार, मीडिया और दिल्ली वासियों द्वारा नजरंदाज किया जाना है। ...

दिल्ली पुलिस एवम् निहंग साहेबान के बीच तीखी बहस के बाद विवाद सुलझा और दिल्ली पुलिस द्वारा निहंग बाबा जी की अपील स्वीकार करने का आश्वासन।।

गर्मियों के मौसम में घोड़ों को होने वाली परेशानी के कारण निहंग साहेबान द्वारा दिल्ली पुलिस से बेरीकेट्स हटाने की मांग पर विचार के लिए अधिकारी तैयार।। ...

अचानक आयी आंधी के कारण गाजीपुर बॉर्डर स्थित किसान आंदोलन स्थल पर कई टेंट तथा अस्थाई डेरों को नुकसान पहुंचा।

गाजीपुर बॉर्डर स्थित किसान आंदोलन स्थल पर तेज आंधी के कारण कई तम्बू तथा डेरे गिर गए । ...

संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा 10 अप्रैल शनिवार को कुंडली, मानेसर- पलवल हाई वे 24 घंटे के लिए काम करने की घोषणा।

आज कुंडली बॉर्डर पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में शनिवार 10 अप्रैल को केएमपी पेरीफेरल रोड को 24 घंटे के लिए जाम करने की घोषणा की गई। ...

संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस में संसद के घेराव की घोषणा के साथ ही समझा जा सकता है कि आंदोलन एक बड़े मोड़ की ओर बढ़ गया है

कुंडली बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा आयोजित विशेष प्रेस कांफ्रेंस में किसान नेता उग्राहां साहब ने सरकार को सीधी चुनौती देते हुए संसद घेराव की घोषणा कर दी। ...

किसान आंदोलन स्थल पर किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा गरमियों के सामने की तैयारी करते हुए स्टेट ऑफ़ आर्ट तथा क्रियेटिव उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

कड़कड़ाती सर्दी और बारिश के साथ बर्फीली हवाओं और जीत चुके किसान अब दिल्ली की सरहदों पर अपने मोर्चो से गर्मी को चुनौती देने के लिए भी तैयार है। ...

किसान आंदोलन को समर्थन देते देश विदेश के धरती पुत्र और इसमें एक और प्रतिष्ठित नाम जुड़ा है अमेरिका के गुरिंदर सिंह खालसा का।

दिल्ली की सरहदों पर चल रहे किसान आंदोलन को समर्थन देने हेतु एक ओर स्थानीय निवासी भी आते है तो विदेशो में रहने वाले भारतीय जिनकी आत्मा में भारत की मिट्टी की सौंधी खुशबू महकती है वो भी निरन्तर साथ खड़े होकर अपना समर्थन देते है। ...

होली के रंग, किसानों के संग ! वैसे तो त्योहारों की खुशी अपने परिवारों के साथ अधिक होती हैं लेकिन विपत्ति काले मर्यादा न अस्ति को मानते हुए किसान आंदोलनकारियों ने धरना स्थल पर ही होली उत्सव मनाया।

भारत उत्सवों और तीज त्यौहारों का देश है और ऐसे में होली को विशेष दर्जा केवल इसलिए दिया जाता हैं क्योंकि एक ओर तो सर्दी की विदाई होती हैं तो दूसरी ओर लहलहाती फसलें किसानों को आर्थिक संबल देने के लिए पुकार रही होती हैं। इस वर्ष की होली किसानों के बीच, किसानों के साथ। ...

किसान आंदोलन कारियो द्वारा भारत बन्द के कारण देश भर से बन्द की सफलता या आंशिक प्रभाव !

26 मार्च संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा भारत बंद का आहवान किया गया जिसे जनता के अतिरिक्त विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया। इसके परिणाम स्वरूप देश के अधिकांश हिस्सों में शांति पूर्वक बन्द रखा गया। रास्ते जाम किए गए तथा रेले हैं गई। ...

किसान आंदोलन का बदलता स्वरूप और लगातार चलता डेडलॉक क्या किसी आने वाले तूफान की आशंका हो सकता है ?

दिल्ली की सरहदों पर किसानों का धरना फिर सरकार से बातचीत और ट्रेक्टर परेड से लेकर लाल किला तथा अब राज्यो मे होने वाले चुनावों में किसान नेताओ की महापंचायत। इन सब के साथ बातचीत टूटे हुए भी दो महीने बीत चुके हैं और सरकार खामोश हैं। क्या यह खामोशी किसी तूफान का संकेत है ? ...

23 मार्च शहीद भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत को सलाम करते हुए चौथे महीने में दाखिल हो चुके किसान आंदोलन कारी फिर से इन्कलाब जिंदाबाद का नारा बुलन्द करेंगे

23 मार्च का दिन जब हिंदुस्तान की आज़ादी की मशाल में तीन रण बंकुरो ने हंसते हंसते अपनी कुर्बानी दे दी थी। उन्ही के सम्मान और सत्कार में दिल्ली की सरहदों पर मोर्चा लगाकर बैठे किसानों ने व्यापक रूप से उनकी कुर्बानियों को याद करने का निर्णय लिया है। ...