तीन तलाक कानून, मोदी सरकार बधाई की पात्र

Rakesh Kumar Sain
Last Updated: Dec 29 2017 11:53

मुस्लिम महिलाओं की छाती पर पड़े तीन तलाक के सदियों पुराने बोझ को हटा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपना नाम तो इतिहास के पन्नों में दर्ज करवा ही लिया है, परंतु इस विधेयक पर लोकसभा में सरकार द्वारा दिखाई गई दृढ़ता ने साबित कर दिया है कि देश में धर्म के नाम पर चली आ रही मनमानियों के दिन बदलने वाले हैं। सदन में पास हुए विधेयक के लिए मोदी सरकार बधाई की पात्र है और इसके लिए कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को भी साधुवाद देना बनता है जिसने अपनी ऐतिहासिक भूल में सुधार करते हुए थोड़ी बहुत झिझक के बाद अंतत: विधेयक को समर्थन दे दिया।

वैसे देखा जाए तो तीन तलाक विधेयक पर कांग्रेस पार्टी व कई विरोधी दल दुविधा में नज़र आए। यह शायद उनकी दशकों पुरानी छद्म धर्मनिरपेक्ष व तुष्टिकरण की नीति का असर था कि कांग्रेस ने इस विधेयक को लटकाने का प्रयास किया। अपनी सरकार के कार्यकाल में शाहबानो केस दौरान कानून बना कर कठमुल्लाओं को प्रसन्न करने वाली कांग्रेस लोकसभा में तरह-तरह के बहाने बना कर तीन तलाक पर आए विधेयक को लटकाने का प्रयास करती दिखी और बाकी छद्म सेक्युलर उसका साथ देते। सेक्युलरों की नज़रें कहीं व निशाना कहीं है, तर्क कुछ करते दिखे परतुं वास्तव में मुस्लिम तुष्टिकरण के दाद को खुजाते अधिक नज़र आए। महान शायर जोक का शेयर फिर इन पर सही बैठता दिखता है कि छुटती नहीं मुंह से काफिर लगी हुई।

अगस्त में तीन तलाक के खिलाफ आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सभी दलों ने स्वागत किया। इस दिशा में कानून बने वह इस फैसले का ऐच्छिक पहलु था। माना गया कि न्यायालय द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बाद कानून की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उस समय सेक्युलरों ने सरकार को ताना भी मारा था कि भाजपा मुस्लिम महिलाओं की सच्ची हमदर्द है तो इस मुद्दे पर संसद में विधेयक लाए, वे समर्थन करेंगे। तर्क दिया गया कि तीन तलाक पर कानून बनाना ही सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की तार्किक परिणति होगी, कानून नहीं बना तो फैसला व्यवहार में बेमानी हो जाएगा। कानून बनाना फैसले को अमली रूप देने के लिए तो जरूरी है ही, इस तथ्य के मद्देनज़र भी जरूरी है कि अदालती फैसले के बाद भी तीन तलाक प्रथा से कोई सौ के करीब मामले सामने आए।

नरेंद्र मोदी सरकार ने जरूरत समझते हुए इस मुद्दे पर कानून बनाने का फैसला लिया जिसका खुलासा उन्होंने गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी किया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में पांच सदस्यीय मंत्रीसमूह ने दो माह के परिश्रम के बाद अब नए कानून का प्रारूप तैयार किया। इस विधेयक पर चली बहस के दौरान सेक्युलर दल अब अपनी अपनी सुविधा व तुष्टिकरण की पुरानी नीति के चलते तरह-तरह के तर्क देकर इसका विरोध करते नज़र आए। इनका पूरा प्रयास रहा कि इस विधेयक को रोकना तो चाहे संभव नहीं परंतु जितना हो लटकाया जाए ताकि मुस्लिम कट्टरपंथियों में संदेश जाए कि वे ही उनके सच्चे हिमायती हैं।

शायद यही कारण था कि संसद में कांग्रेस दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसदीय समिति बनाने का सुझाव दिया। बिल पर कोई संशोधन या सुझाव तो वह या कांग्रेस का कोई भी नेता सदन में भी दे सकते थे। बता दें कि लोकसभा में पारित किए गए विधेयक में तुरंत तीन तलाक को अपराध ठहराया है और अपराध करने वाले को तीन साल की जेल व जुर्माना भी हो सकता है। कानून बन जाने पर पीड़िता को दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) से अपील करने और अपने तथा अपने बच्चों के लिए गुजारा-खर्च पाने का अधिकार होगा।

तुरंत तीन तलाक या 'तलाक-ए-बिद्दत' दशकों से काफी विवादास्पद मसला रहा है। इस पर सुनवाई करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में भी सर्वसम्मति नहीं बन पाई थी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई मुस्लिम संगठन इसका विरोध करते रहे। इस विरोध को अपरोक्ष समर्थन मिलता दिखा कथित सैक्युलर दलों का। कांग्रेस ने कहा कि वह अन्य दलों के साथ मिलकर एक बार फिर से इस बिल के प्रारूप को देखना चाहती है। पार्टी प्रवक्ता और सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि वे तीन तलाक को अपराध साबित करने वाले इस बिल पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, यह देखना होगा कि सरकार अदालत के निर्णय के आधार पर ही इस बिल को पेश करे अन्यथा विरोध करेंगे। खड़गे ने विधेयक लटकाने के लिए संसदीय समिति का सुझाव दिया।

तुष्टिकरण की दूसरी झंडाबरदार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) के सांसद मोहम्मद सलीम ने कहा है कि जब अदालत तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा चुकी है तो इस पर अलग से विधेयक की आवश्यकता नहीं है। तलाक को आपराधिक श्रेणी में नहीं डालना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने भी तीन तलाक पर प्रस्तावित बिल का विरोध किया है। तर्क दिया कि जब तक बहु-विवाह प्रथा को अवैध नहीं किया जाता तो पुरुष तलाक दिए बिना वही रास्ता अपनाने लगेंगे।

प्रश्न उठाए जा रहे हैं कि देश में केवल मुस्लिमों को ही तलाक देने पर सजा मिलेगी, हिंदू व ईसाईयों को नहीं। एक साथ तीन तलाक देने पर 3 साल की सजा होगी जो उचित नहीं। यह भी कहा जा रहा है कि यह कानून धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। देश में जब अपराधिक न्यायिक संहिता (सीआरपीसी), घरेलु हिंसा विधेयक, क्रूरता विरोधी नियम हैं तो तीन तलाक पर कानून की क्या आवश्यकता है? मुस्लिम ला बोर्ड तर्क दे रहा है कि इस्लाम में विवाह सामाजिक विषय है और इस पर दिवानी मुकद्दमे (सिविल केस) ही चलते हैं न कि अपराधिक याने क्रिमिनल।

प्रथमदृष्टया बड़े तर्कसंगत लगते हैं इस तरह के प्रश्न परंतु पूरी तरह आधारहीन और मुद्दे को भटकाने वाले ज्यादा लगते हैं। न्यायालय के प्रतिबंध के बावजूद भी देश में तीन तलाक जारी हैं और इस निर्णय के बाद 100 के लगभग नए मामले सामने आ चुके हैं, इसीलिए ही तीन तलाक पर विधेयक जरूरी हो गया। नए कानून से तलाक की प्रकिया बंद नहीं होगी बल्कि एक ही समय तीन तलाक को दंडनीय बनाया गया है। इस्लाम में जारी तलाक-ए-एहसान व तलाक-ए-हसन उसी तरह जारी रहेंगे।

तीन तलाक के मामले को घरेलु हिंसा अधिनियम से इसलिए नहीं निपटा जा सकता क्योंकि जब विदेश या दूरदराज इलाके में बैठा पति मोबाईल, ई-मेल, चिट्ठी से तलाक देता है तो पीड़ित महिला कै से घरेलु हिंसा के आरोपों को साबित कर पाएगी। दिवानी मामले को अपराधिक मामले में परिवर्तित करने का विरोध करने वाले भूलते हैं कि जब शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उसे भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया तो इन्हीं सेक्युलर दलों की सरकार ने अपराधिक मामले को दिवानी मामले में परिवर्तित कर संविधान में संशोधन कर दिया था।

हिंदुओं में भी तो विवाह को दिवानी मामला है परंतु दहेज को अपराधिक माना गया है। हिंदू समाज में तो तलाक का प्रावधान ही नहीं है, पारस्कर गृहसूत्र और जैमिनी गृहसूत्र जो विवाह से संबंधित हैं शादी को सात जन्मों का बंधन बताते हैं। तीन तलाक को धार्मिक स्वतंत्रता के साथ जोड़ने वाले भूलते हैं कि यह विषय लैंगिक समानता का भी है जिसका अधिकार भी हमारा संविधान सभी नागरिकों को देता है। संविधान के राज्य की नीति के दिशा निर्देशक सिद्धांतों में नागरिकों को निर्देश दिया गया है कि वह महिला के सम्मान के खिलाफ किसी भी कदम का विरोध करें।

कानून पर और चर्चा करने की बात करने वाले भूलते हैं कि इस विषय पर देश भर में 1978 से चर्चा चल रही है जब 62 वर्षीय महिला शाहबानो को उसके पति ने तलाक दे दिया और अदालत ने जब उसे न्याय देने का फैसला किया तो 1986 में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने संसद में विधेयक लाकर अदालत के फैसले को ही बदल दिया। अब प्रश्न पैदा होना स्वभाविक ही है कि क्या विरोधी चर्चा के नाम पर इस मामले को और लटकाने का प्रयास तो नहीं कर रहे थे? फिलहाल अंत भला तो सब भला, प्रसन्नता का विषय तो यह है किमोदी सरकार ने सभी तरह के षड्यंत्रों व कुतर्कों को तिलांजलि दे कर लोकसभा में इस विधेयक को पारित करवा कर सदियों से चली आ रही एक कुप्रथा को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया है। इसके लिए सरकार बधाई की पात्र है।

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