भारतीय कूटनीति की बहार, चाबहार

Rakesh Kumar Sain
Last Updated: Dec 07 2017 12:39

भारतीय कूटनीति ईरान के चाबहार बंदरगाह के रूप में आखिरकार सफल रही और भारत ने पाकिस्तान के साथ-साथ अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी चीन को भी करारी शिकस्त दी है। ईरान स्थित उक्त बंदरगाह के माध्यम से भारत अपना सामान अफगानिस्तान के साथ-साथ अरब देशों में आसानी से भेज सकेगा और सामरिक दृष्टि से भी यह बंदरगाह चीन द्वारा भारत को घेरने की योजना की काट बताई जा रही है। इस परियोजना की शुरुआत साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। चाबहार के परिचालन का पहला चरण रविवार को पूरा हो गया। इस बंदरगाह का उद्घाटन ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी ने किया। उन्होंने इस दिन को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह बंदरगाह कई देशों को जोड़ेगी। इस मौके पर भारत के जहाजरानी राज्यमंत्री पी. राधाकृष्णन समेत दूसरे कई देशों के मंत्री और राजदूत भी मौजूद थे। इससे एक दिन पहले यानी शनिवार को शंघाई सहयोग संगठन की रूस में संपन्न बैठक से वापस लौटते हुए विदेशमंत्री सुषमा स्वराज तेहरान रुकी थीं। वहां उन्होंने अपने ईरानी समकक्ष जावेद शरीफ से मुलाकात की और दूसरे मुद्दों के साथ-साथ चाबहार पर भी चर्चा की।

सनद रहे कि पहले हमें अपना सामान अफगानिस्तान भेजने के लिए पाकिस्तान हो कर जाना पड़ता था और वहां की सरकार से इजाजत लेनी पड़ती थी परंतु अब भारत अपने उत्पादों को अफगानिस्तान तक बिना किसी रोक-टोक के भेज सकेगा। यह बंदरगाह महज एक रास्ता नहीं है। यह भारत की कारोबारी और कूटनीतिक, दोनों नजरिए से एक बड़ी सफलता है। चीन पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है। वह अपने साजोसामान वहां बेरोकटोक लाना चाहता है। ऐसे में ईरान की जमीन पर भारत द्वारा चाबहार को विकसित करना कारोबार के अलावा सामरिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वहां से ग्वादर की दूरी महज अस्सी किलोमीटर है।

यहां यह बताना भी जरूरी है कि 'स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स' नामक परियोजना के तहत चीन, पाकिस्तान के ग्वादर से लेकर श्रीलंका के हंबनटोटा तक बंदरगाह विकसित रहा है। कहने को यह व्यवसायिक गतिविधि है परंतु इसके माध्यम से चीन भारत को घेरने की फिराक में है। अब चाबहार के चालू होने से पहला झटका पाकिस्तान को लगा है, क्योंकि भारत-अफगानिस्तान के बीच व्यापार को रोकने की उसकी कोशिश नाकाम हो गई है। इसके अलावा, यह बंदरगाह मध्य एशिया तक भारत की पहुंच बढ़ाने में सहायक होगा। पाकिस्तान के रास्ते चीन की सुरक्षित लाइन बनाने की कोशिश को किसी संकट की स्थिति में भारत अब बाधित कर सकता है। इस परियोजना की नींव 2002 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब के ईरानी राष्ट्रपति सैयद मोहम्मद खातमी ने डाली थी। अब भारत इस रास्ते भारी मात्रा में अपना माल भेज सकता है।

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