International Yoga Day: जानिए कहां से और कैसे आया योगा मैट...

Last Updated: Jun 20 2019 18:58
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साल 2016 की एक योग जर्नल रिपोर्ट के अनुसार लगभग 36.7 मिलियन लोग अमेरिका में योग का अभ्यास करते हैं। जबकि साल 2012 में केवल 20.4 मिलियन लोग ही योगा करते थे। बता दें, 'योग बाजार' की कीमत अमेरिका में 16 बिलियन डॉलर और वैश्विक स्तर पर 80 बिलियन डॉलर है। बता दें, लगभग 60 प्रतिशत व्यापार योग से जुड़े सामान की मदद से होता है। जिसमें योग मैट का निर्माण और बिक्री प्रमुख है। आखिरकार ये मैट कैसे और कहां से नोटिस में आए। 

1970 के दशक तक, लोग योग करने के लिए 'दरी' या चटाई पर बैठते थे। हालांकि, आज दुनिया भर में, लोगों को रबर के योग मैट पर योग का अभ्यास करते हुए देखा जाता है। लोगों ने कब दरी छोड़कर योग करने के लिए इन खास योगा मैट का उपयोग करना शुरू कर दिया। बता दें, योग मैट्स के निर्माण का श्रेय भी किसी और को नहीं बल्कि योग गुरु, बीकेएस अयंगर को जाता है। वह भी उस समय के अन्य योग चिकित्सकों की तरह फर्श पर कंबल बिछाकर योग का अभ्यास करते थे। 1960 के दशक में, जब उन्होंने यूरोप में सार्वजनिक कक्षाओं को पढ़ाना शुरू किया, तो उन्होंने पाया कि यूरोपियन छात्रों को खड़े होकर आसन करने में कठिनाई होती थी, उनके पैर फिसलते रहते थे। जिसकी वजह से वो आसन पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते थे। 
 
हालांकि उन्होंने भारत में छात्रों को पढ़ाने के दौरान इस तरह की किसी परेशानी का कभी कोई सामना नहीं किया। इसके पीछे जो कारण था वो यह था कि भारत में वो जिस फर्श पर छात्रों को पढ़ाते थे वह कुडप्पा नाम की चट्टान से बने पत्थर का बना हुआ था जबकि पश्चिमी फर्श अलग तरह के थे। फिर, एक दिन जर्मनी में, उन्हें हरे रंग की रबड़ की चटाई कार्पेट के नीचे रखी मिली जिसने उन्हें फिसलने से बचाया। जिसके बाद उन्होंने सोचा, "क्या यह मैट योग छात्रों को खड़े होकर आसन करने के दौरान फिसलने से रोकने में मदद करेंगे और उन्होंने अनुमान लगाया था वैसा ही हुआ। 

उन्होंने इस हरी रबड़ की मैट को 'स्टिकी मैट' का नाम दिया। जिसके बाद ब्रिटेन के छात्रों ने जर्मनी से योगा मैट का पहला रबर मैट का सेट खरीदा। बाद में, इसी तरह की नीले मैट जर्मनी में ही बनाए गए। जिसके बाद जर्मनी ही योग मैट का मुख्य निर्माता बन गया था। यद्यपि, यूके, यूरोप और अमेरिका में अयंगर योग चिकित्सकों ने इन योग मैट का उपयोग करना शुरू कर दिया, मुंबई और पुणे के छात्र ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि ये मैट फिलहाल भारत में उपलब्ध नहीं थे। हालांकि, विदेशी छात्र जो स्रोत सीखने के लिए पुणे आए हुए थे उन्होंने अपने मैट वही छोड़ना शुरू कर दिए। जिसके बाद योग मैट के उत्प्रेरकों ने उन्हें अपने संस्थान में रखा।

अब इन मैटों को स्टिकी मैट नहीं बल्कि 'योग' मैट कहा जाता है। इतना ही नहीं अब इन मैट्स को नाइके और रीबॉक जैसी बड़ी स्पोर्टिंग कंपनियों द्वारा ब्रांडेड मैट के रूप में बेचा जाता है। जिससे योग मैट का निर्माण को एक बिलियन डॉलर का उद्योग बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत में अभी तक भी यह मैट नहीं बनाए जाते हैं। आयुष मंत्रालय ने राज्यसभा को दिए आंकड़ों के मुताबिक पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए चीन को 37,000 मैटों का आयात करने के लिए 92 लाख रुपए खर्च किए। जबकि हमारे पास मेक इन इंडिया प्रोग्राम है, क्या यह समय नहीं है कि हम भारत में योग मैट बनाने की शुरुआत करें। जबकि इसका विषय और इसकी खोज करने वाला व्यक्ति खुद भारतीय है।