होला मोहल्ला: कुछ इस तरह मनाई जाती है आनंदपुर साहिब में होली

Last Updated: Mar 17 2019 17:38

एक तरफ पूरा देश हरे, नीले,पीले रंगों में खुद को सराबोर कर रहा होता है तो वहीं पंजाब के आनंदपुर साहिब में पूरे उत्साह के साथ होला मोहल्ला मनाया जाता है। आप सोच रहे होंगे की आखिर ये होला मोहल्ला क्या है, और उसे कौन, कहां एवं कैसे मनाता है। तो आप चिंता न करें आज हम आपको सब बतायंगे होला मोहल्ला पंजाब राज्य में आनन्दपुर साहिब में होली के अगले दिन लगने वाला मेला है, जिसे बड़े ही हर्षोल्लाल्स के साथ मनाया जाता है। सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री आनन्दपुर साहिब बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। इसीलिए दशम गुरू गोविंद सिंह जी ने होली के लिए पुल्लिंग शब्द होला मोहल्ला का प्रयोग किया। गुरु जी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे।

होला महल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छ: दिन तक चलता है। इस अवसर पर, भांग की तरंग में मस्त घोड़ों पर सवार निहंग, हाथ में निशान साहब उठाए तलवारों के करतब दिखा कर साहस, पौरुष और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं। जुलूस तीन काले बकरों की बलि से प्रारंभ होता है। एक ही झटके से बकरे की गर्दन धड़ से अलग करके उसके मांस से "महा प्रसाद" पका कर वितरित किया जाता है। पंज पियारे जुलूस का नेतृत्व करते हुए रंगों की बरसात करते हैं और जुलूस में निहंगों के अखाड़े नंगी तलवारों के करतब दिखते हुए बोले सो निहाल के नारे बुलंद करते हैं। आनन्दपुर साहिब की सजावट की जाती है और विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है। कहते है गुरु गोबिन्द सिंह (सिक्खों के दसवें गुरु) ने स्वयं इस मेले की शुरुआत की थी। यह जुलूस हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती एक छोटी नदी चरण गंगा के तट पर समाप्त होता है।

इस परंपरा को गुरु गोविंद जी ने प्रारंभ किया

गुरु गोविंद सिंह जी ने इस त्योहार को परमात्मा के प्रेम रंग में सराबोर कर अधिक आनंददायी स्वरूप दिया। श्री गुरुग्रंथ साहब में होली का उल्लेख करते हुए प्रभु के संग रंग खेलने की कल्पना की गई है। गुरुवाणी के अनुसार परमात्मा के अनंत गुणों का गायन करते हुए प्रफुल्लता उत्पन्न होती है और मन महा आनंद से भर उठता है। जब मनुष्य होली को संतों की सेवा करते हुए मनाता है तो लाल रंग अधिक गहरा हो जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने होली को आध्यात्मिकता के रंग में रंग दिया। उन्होंने इसे होला महल्ला का नाम दिया। 

होला मोहल्ला से जुड़ी कुछ खास बातें 

*होला शब्द होली की सकारात्मकता का प्रतीक था और महल्ला का अर्थ उसे प्राप्त करने का पराक्रम। 
*रंगों के त्योहार के आनंद को मुखर करने के लिए गुरु जी ने इसमें व्याप्त हो गई कई बुराइयों जैसे कीचड़ फेंकने, पानी डालने आदि का निषेध किया। 
*होला मोहल्ला उत्सव का आरंभ लगभग 1701 के आसपास हुआ था। 
*जब गुरु गोबिंद सिंह अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रखने के लिए उन्हें छद्म लड़ाई के लिए प्रेरित करते थे।
*ये  जुलूस हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती एक छोटी नदी चरण गंगा के तट पर समाप्त होता है।
*होला महल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छ: दिन तक चलता है।
*इस अवसर पर, भांग की तरंग में मस्त घोड़ों पर सवार निहंग, हाथ में निशान साहब उठाए तलवारों के करतब दिखा कर साहस, पौरुष और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं।
*जुलूस तीन काले बकरों की बलि से प्रारंभ होता है। 
*एक ही झटके से बकरे की गर्दन धड़ से अलग करके उसके मांस से "महा प्रसाद" पका कर वितरित किया जाता है।
*पंज पियारे जुलूस का नेतृत्व करते हुए रंगों की बरसात करते हैं और जुलूस में निहंगों के अखाड़े नंगी तलवारों के करतब दिखते हुए "जो बोले सो निहाल" के 
 नारे बुलंद करते हैं।