जानिए क्या है इस अद्भुत कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास

Last Updated: Feb 05 2019 18:01

बेहद खूबसूरत और रहस्यमयी कोणार्क भारत के उड़ीसा के चंद्रभागा नदी के किनारे पर स्थित है। कोणार्क शब्द, कोण और अर्क शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। यह 13वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है। यह मंदिर बहुत बडे रथ के आकार में बना हुआ है, जिसमे कीमती धातुओ के पहिये, पिल्लर और दीवारे बनी हैं। 

यह मंदिर सूर्यदेव (अर्क) को समर्पित था, जिन्हें स्थानीय लोग बिरंचि-नारायण कहते थे। पुराणानुसार, श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को श्राप से कोढ़ रोग हो गया था। उन्हें ऋषि कटक ने इस श्राप से बचने के लिए सूरज भगवान की पूजा करने के लिए कहा गया। साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की, और सूर्य देव को प्रसन्न किया। जिसके बाद सूर्यदेव ने इसका रोग खत्म कर दिया ।

इस सूर्य मंदिर ने कामुकता को एक नई परिभाषा दी है। यहां बनी मूर्तियों में बड़ी ही खूबसूरती के साथ काम और सेक्स को दर्शाया गया है। यहां बनी मूर्तियां पूर्ण रूप से यौन सुख का आनंद लेती दिखाई गई हैं। इन मूर्तियों को मंदिर के बाहर तक ही सीमित किया गया है ऐसा करने के पीछे कारण ये बताया जाता है कि जब भी कोई मंदिर के गर्भ गृह में जाए तो वो सभी प्रकार के सांसारिक सुखों और मोह माया को मंदिर के बाहर ही छोड़ के आये। ऐसा माना जाता है कि यहां आज भी नर्तकियों की आत्माएं आती हैं। लोगों का कहना है कि यहां शाम में उन नर्तकियों के पायलों की झंकार सुनाई देगी जो कभी यहां राजा के दरबार में नृत्य करती थी।

जानिए क्यों नहीं होती इस मंदिर की पूजा 
ये एक ऐसा मंदिर हैं जिसमें पूजा नहीं होती। यहां के स्थानीय लोगों की माने तो आज तक इस मंदिर में कभी पूजा नहीं हुई और अब तक ये मंदिर एक वर्जिन मंदिर है। कहा जाता है कि मंदिर के प्रमुख वास्तुकार के पुत्र ने राजा द्वारा उसके पिता के बाद इस निर्माणाधीन मंदिर के अंदर ही आत्महत्या कर ली, जिसके बाद से ही इस मंदिर में पूजा और अन्य धार्मिक कामों पर प्रतिबन्ध लगा गई।