प्रेम - आखिर ये प्रेम क्या है, क्या आप इसके मूल अर्थों से परिचित हैं...

Last Updated: Jan 21 2019 19:13
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ये शीर्षक पढ़ कर आपके मन में भी उत्सुकता जागी होगी कि आखिर प्रेम की वास्तविक परिभाषा है क्या? क्या आप जानते हैं इसका सच्चा अर्थ और परिभाषा? यदि नहीं तो शायद आज इसे अंत तक पढ़ कर आपको कुछ न कुछ जानने को आवश्य मिलेगा।

ये प्रेम है क्या? संतान और माँ के हृदय में एक-दूसरे के प्रति होता है वो, भाई और बहन के मध्य जो एक-दूसरे के प्रति होता है वो, एक गुरु के प्रति शिष्य के मन में होता है वो, अपने आराध्य के प्रति जो किसी भक्त में होता है वो या फिर इंसानीयत के नाते हम एक-दूसरे से करते हैं वो। खैर इसकी बहुत सारी परिभाषाएं हैं जो कि समय की बढ़ती हुई गति के अनुसार बदलती रहती हैं।

जब कभी प्रेम की बात आती है तो श्री राधा कृष्ण की दिव्य तथा प्रेममयी युगल जोड़ी को सबसे पूर्व स्मरण किया जाता है और अनंत काल तक याद किया जाता रहेगा। लेकिन क्या हम उनके सच्चे प्रेम को समझते हैं...

शायद हाँ और नहीं भी क्योंकि श्री राधा कृष्ण के इस वसुंधरा पर अवतरण का मुख्य मंतव्य जग प्राणियों के मनों से सभी प्रकार के विकारों का अंत कर उन्हें प्रेम रुपी शुद्ध एवं सच्चे तत्व से रू-ब-रू करवाना था। लेकिन फिर भी आज-कल के लोगों में न तो वैसा प्रेम है और न ही आपसी स्नेह। परन्तु ऐसा क्यों और इसका मूल कारण क्या है? क्या आप इसे समय का प्रभाव कहेंगे, लोगों में पनपती आपसी कटुता, धन कमाने की लालसा या फिर सबसे आगे रहने का अहंकार। इनमें से कुछ भी हो सकता है।

'कलियुग' का प्रभाव ही अपनी चरम सीमा पर है तो ये सब होना लाज़मी भी है अर्थात कलियुग के "कलि" का अर्थ ही 'कलह', 'झगड़ा' या 'विवाद' है। परन्तु श्री युगल जोड़ी सरकार का अलौकिक प्रेम इस दुनियावी प्रेम से कहीं ऊपर और सर्वोपरि था और है। श्री राधा रानी के रोम-रोम में श्री कृष्ण वास करते हैं इसीलिए तो कहा जाता है "राधे बिना श्याम आधे"


श्री राधा रानी व श्री कृष्ण मुरारी एक-दूसरे से सच्चा प्रेम करते थे इसीलिए श्री राधा रानी का नाम भी मुरली मनोहर से पूर्व लिया जाता है और इसके साथ कई सुन्दर और मन भावन प्रसंग भी जुड़े हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार श्री ठाकुर जी के सिर में दर्द उठा और उन्होंने अपनी इस पीड़ा को दूर करने के लिए गोपियों से चरणामृत माँगा किन्तु पाप का भागी बनने के भय से किसी ने भी श्री कृष्ण को चरणामृत नहीं दिया।

फिर मधुसूदन, श्री रुक्मिणी जी जिन्हें शास्त्रों में महालक्ष्मी जी का स्वरूप बताया गया है और जो श्री कृष्ण की प्रथम पटरानी थीं, अपनी पीड़ा के समाधान हेतु उनके पास गए परन्तु श्री रुक्मिणी जी ने भी ये कह कर कि 'हे प्रभु! आप तो सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार हैं, तो मैं इतना बड़ा पाप नहीं कर सकती' ऐसा करने से मना कर दिया।

फिर जब इसके बारे में श्री वृन्दावनेश्वरी श्री राधा रानी को पता चला तो वो दौड़ी-दौड़ी अपने केशव के पास गईं और बिना विलम्ब किए व पाप पुण्य का भय छोड़ अपने सांवरे को चरणामृत देकर उन्हें पीड़ा मुक्त किया। इस मन को मोह लेने वाले प्रसंग से आप अंदाज़ा तो लगा ही सकते हैं कि उनके मध्य कितना नि:स्वार्थ व गहन प्रेम था। 

यही तो है यथार्थ एवं नि:स्वार्थ प्रेम जिसका अभिप्राय बिना अपने स्वार्थ के अपने बारे में सोचे लेना नहीं अपितु देना है अर्थात समर्पण ही तो है सच्चा प्रेम। कई बार हम और आप जैसे एक बहुत बड़ी भूल कर बैठते हैं और वो भूल क्या है? हमारे मन में एक-दूसरे के प्रति जो स्नेह या लगाव का भाव है क्या यही है प्रेम। ये मोह भी तो हो सकता है। अब आप सोच रहे होंगे कि मोह भी तो प्रेम का ही एक रूप है तो मोह और प्रेम में अंतर कैसे हुआ। चलिए उदाहरण लेकर समझने की कोशिश करते हैं। 

बाल्यकाल में अपनी संतान के प्रति प्रत्येक माँ-बाप के हृदय में अतुल्य ममत्व और वात्सल्य होता है क्योंकि उस समय बच्चा गीली मिट्टी के समान होता है जिसे जिस भी सांचे में ढालो वो वैसा ही ढल जाता है। सभी माता-पिता अपनी संतान को स्नेह, ममता और असीम प्रेम से पाल-पोस कर बड़ा करते हैं और उनमें अपनी संतान को लेकर एक भय उत्पन्न हो जाता है कि कहीं उनकी संतान को कोई हानि न पहुंचा दे। 

इसीलिए किसी कारणवश वो अपनी संतान को अपने से दूर नहीं जाने देते लेकिन जब संतान ब्रह्मचर्य आश्रम की ओर अग्रसर होती है तब उसके विकास के लिए आवश्यक होता है कि वो बिना अपने माँ-बाप की सहायता के अपने स्वयं के अनुभवों से सीख कर अपने जीवन में आगे बढ़े परन्तु मोह के पाश में फंसे अभिभावक अपनी संतान को अपने से दूर नहीं कर पाते तो ये प्रेम कैसे हुआ क्योंकि प्रेम से तात्पर्य बंधन नहीं अथवा किसी को बांधना नहीं अपितु मुक्त करना है यानि मुक्ति है।

यदि हमें अपने जीवन में कुछ बनना है कुछ सीखना है तो हमें अपनों से दूर जाना ही पड़ता है। पक्षी भी जब तक अपना घोंसला छोड़ पंख नहीं फैलाता तब तक वो भी उड़ना नहीं सीख पाता। मोह है जो हमें बंधन में बांधता है और ऐसी परिस्थितियों में डाल देता है जिसके वश में आकर हम आगे नहीं बढ़ पाते और प्रेम वो है जो हमें बिना किसी भय के आज़ादी प्रदान कर सफलता के मार्ग की ओर अग्रसर करता है। 

          ब्रजेश्वरी श्री राधा रानी के मन में बसे कृष्ण स्वरूप के प्रति किसी ने बड़े ही सुन्दर भाव प्रकट करते हुए लिखा है:-

                       || पाने को ही प्रेम कहे ये है जग की रीत, प्रेम अर्थ समझाएगी राधे कृष्णा की प्रीत ||

                                                      कितना गहरा सत्य छिपा है इस छोटी सी पंक्ति में...
  
इसीलिए जब भी प्रेम तत्व जानना हो, समझना हो तो परम धन श्री राधे श्याम के सुन्दर, दिव्य और प्रेममयी प्रसंग आवश्य पढें। विश्वास कीजिये धीरे-धीरे ही सही किंतु आप भी प्रेम का वास्तविक एवं मूल तात्पर्य जान जायेंगे। क्योंकि श्री युगल जोड़ी सरकार का इस धरा पर आना प्राणियों को प्रेम के सही माईने समझाना था उन्हें जागृत करना था। इसीलिए श्री बांके बिहारी के जन्म स्थान गोकुल धाम एवं जहाँ-जहाँ उन्होंने लीलाएं की एवं जहाँ-जहाँ उनके पावन चरण पड़े बरसाना धाम, ब्रज धाम, श्री वृन्दावन धाम, मथुरा आदि इन सभी धामों के दर्शन कर लेने भर मात्र से ही आत्मिक सुख एवं परम आनंद की अनुभूति होती है।

                            
                              वह मोद न मुक्ति के मंदिर में, जो मोद भरा ब्रजधाम में है,
                                                                   इतनी छवि राशि अनंत कहाँ? जितनी छवि सुंदर राधे श्याम में है, 
                          शशि में सरोज न सुधा रस में, न ललाम लता अभिराम में है, 
                                                                   इतना सुख और किसी में नहीं जितना सुख श्री राधे कृष्णा के नाम में है...

                                                                                                                                                              -देवी चित्रलेखा जी

                             
     नाम रस में डुबकी लगा कर तो देखो, यहाँ डूबने में परम आनंद है और वो आएगा भी परन्तु प्रयास करने पर... 
                                  तो आप भी प्रेम से रहिये, प्रेम बाँटिये और प्रेम से सदैव बोलते रहिये

                                                         || राधे राधे ||